विश्व के मानचित्र को फैला कर देखें तो ब्लैक कांटिनेंट अफ्रीका का एक बहुत बड़ा धब्बा इसमें नज़र आता है। इसी धब्बे के भीतर छोटे-छोटे बिंदुओं का एक पूरा संजाल बिछा है- केनिया, इथियोपिया, सोमालिया…
इन्हीं बिंदुओं में क़ैद है माहरा जैसी करोड़ों औरतें जिनके जीवन का हर पल जाने कितनी सदियों से दुःख और दर्द की काली स्याही से लिखा जा रहा है। सिर्फ इसलिए कि वह औरतें हैं!
इन्हीं कमनसीब औरतों के दुःख-दर्द और उच्छ्वासों की कहानी बटोर कर लाई गई है उपन्यास ‘दर्दजा’ में। लेखक जयश्री रॉय चाहती हैं, इस क़िताब को पढ़ते हुए एक पल के लिए ही सही, पाठक माहरा और उसके जैसी तमाम औरतों के उस नारकीय यंत्रणा और अंतहीन शोक को महसूस करे, जिसमें जीने के लिए वह पीढ़ी दर पीढ़ी अभिशप्त हैं। बिना अनुभव किये दूसरों की पीड़ा के प्रति पूरी तरह संवेदनशील शायद हुआ नहीं जा सकता है।
बहनापे की इस भावना के साथ कि जब स्त्रियों की नियति ही साझे की है तो दुःख-सुख भी आपस में ईमानदारी से बाँट लेना चाहिए, सुदूर सोमाली की यह करुण गाथा पूरे मन और सम्वेदना के साथ लिखी गई है। यह क़िताब हमें बताती है, औरत का औरत होना ही असल में दुःख में होना है, बद्दुआ में होना है, अज़ाब में होना है…



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