जयश्री रॉय

मैं चुप रह कर किसी गुनाह का साथ नहीं देना चाहती  – जयश्री रॉय

मेरा जन्म हज़ारीबाग, झारखंड (तब बिहार) में हुआ. आठवीं तक की पढाई वही से की. विगत 37 सालों से गोवा में हूं.

लेखन का शौक कब से पैदा हुआ कहना कठिन है. सच कहूं तो मुझे पता भी नहीं. अगर यह कहूं तो अतिशयोक्ति नहीं होगी कि लेखन मुझ में है- हमेशा से. जिस तरह मछली जन्म से तैरना जानती है, पंछी उड़ना जानता है,  मैं लिखती हूं. यह स्वाभाविक, सहज है मुझ में. मुझे याद है, बचपन में जब भी, जहां भी अवसर मिलता था, हम कहानी सुनने या सुनाने बैठ जाते थे. मेरे पिता बहुत अच्छा लिखते और कहानी सुनाते थे. हम सब भाई-बहन उन्हें घेर कर देर रात तक कहानियां सुना करते थे.

अब सोचती हूं तो लगता है, कहानी कहते-सुनते लिखने की ज़मीन भी उन्हीं दिनों कहीं तैयार हुई होगी. इन कहानियों में अधिकतर हमारी सुप्त इच्छायें छिपी रहती थीं जिनकी पूर्ति हम उन कहानियों के माध्यम से किया करते थे. देखा जाय तो आज भी हम यही करते हैं, अपनी कहानियों में अधूरे सपनों की पूर्णता ढूढ़ते हैं, जीवन की विसंगतियों का समाधान ढूंढ़ते हैं, वह मुकम्मल दुनिया बनाना चाहते हैं जिसमें कुछ भी आधा-अधूरा ना हो!

बी. ए. फाईनल में मेरे विषय पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन तथा पॉलिटिकल साइंस थे. मातृभाषा बांगला और पढ़ाई-लिखाई अधिकतर अंग्रेज़ी माध्यम से. निवास गोवा जैसे अहिंदी भाषी प्रदेश में. फिर भी मैंने लेखन को और वह भी हिंदी में क्यों चुना- यह मुझसे पूछा जाने वाला सबसे आम सवाल है. इसका जवाब बहुत सहज-सरल है- हिंदी प्रेम और राष्ट्र प्रेम! दीया पहले अपने घर में जलाया जाता है. मुझे अपने मन की बात अपनों के लिये अपनी भाषा में लिखनी थी. यह मेरा सरोकार भी है, दायित्व भी. जिस देश, समाज के लिये हम लिखना चाहते हैं, उसके अधिकतर लोग यही भाषा समझते और बोलते हैं. जन साधारण की भाषा ही साहित्य की भाषा होनी चाहिये, तभी वह सहज लोगों तक पहुंचती और स्वीकृत होती है.

साहित्य सर्जन से मिलता क्या है, इस प्रश्न का भी सामना अधिकतर करना पड़ता है. हम अपना समय दे कर, श्रम से, निष्ठा और ईमानदारी से कथा-कहानी सिरजते हैं, जाने कहां-कहां से इकट्ठा किये हुये जीवनानुभवों को पाठकों के लिये क़लमबद्ध करते हैं, एक बेहतर दुनिया का स्वप्न शब्दों में बुनते हैं, अपनी सम्बद्धता, सरोकार को भाषा के माध्यम से आकार देते हैं. जब पूरी दुनिया सोती है, कथाकार एक बेहतर कल, एक बेहतर सुबह का सपना देखता हुआ जागता है. इस श्रम-साधना के बदले उसका एक मात्र हासिल उसका आत्म संतोष होता है जो उसे उसके सृजन के क्षणों में मिलता है. अपने नागरिक उत्तर दायित्त्वों के निर्वहन और सरोकार बोध से उसे जिस संतोष की उपलब्धि होती है उसकी तुलना किसी ऐश्वर्य से नहीं हो सकती. इस लेखन के लिये फिर उसे कितने भी अपमान, उत्पीड़न और षडयंत्र का सामना क्यों ना करना पड़े, उसे इनकी रत्ती भर भी परवाह नहीं होती. महान उद्देश्यों की पूर्ति के लिये किये गये यज्ञों में आहूति तो चढ़ानी ही पड़ती है!

मैं लिखती हूं क्योंकि मैं चुप रह कर किसी गुनाह का साथ नहीं देना चाहती . बोलना चाहती हूं, अपनी आपत्ति दर्ज़ कराना चाहती हूं, कहना चाहती हूं हर गलत के विरुद्ध ’आई ऑबजेक्ट’. मेरा मानना है, क़लम दुनिया की सबसे मजबूत हथियार है. सबसे तेज़ है इसकी धार. विचारों का भार सबसे बड़ा भार होता है. एक नाज़ुक क़लम जब उसे उठा लेती है तो फिर यह अकेली सबका सामना कर सकती है. इसीलिये मैंने इसे चुना है, अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया है.

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