हिंदू धर्म में दशहरा सबसे प्रचलित त्योहारों में से एक है। देवी दुर्गा को आराध्य मानकर पूरे भारत के अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग रस्मों रिवाजों से इस त्योहार को मनाया जाता है। कहीं यह ‘मैसूर दशहरा’ के नाम से प्रसिद्ध है तो कहीं ‘कोटा दशहरा’ के नाम से। 10 दिनों तक चलने वाले इस त्योहार को हिंदू धर्म के लोग बड़ी श्रद्धा और धूम-धाम से मनाते हैं। हिन्दू पौराणिक कथाओं में देवी दुर्गा का बखान मिलता है। गौरतलब है कि महिषासुर नाम के दानव द्वारा अत्याचार बढ़ने पर देवों द्वारा महिषासुर के विनाश के लिए देवी दुर्गा को रचा गया था। इसके बाद देवी दुर्गा ने महिषासुर का बद्ध किया। यही कारण है कि देवी दुर्गा को  ‘महिषासुरमर्दिनि’ के नाम से भी जाना जाता है। हिन्दू धर्म के लोग देवी दुर्गा को बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतिक मानते हैं।
कोटा राजस्थान के बड़े शहरों में से एक है। यह ‘चंबल नदी’ के किनारे बसा हुआ है। यूं तो यह शहर इंजीनियरिंग और मेडिकल में प्रवेश की तैयारी के लिए प्रसिद्ध है, लेकिन इसके अलावा ‘कोटा दशहरा’ का आयोजन भी इस शहर में आगंतुकों को अपनी ओर आकर्षित करता है। कोटा दशहरा के अवसर पर लाखों की संख्या में यहां पर्यटक आते हैं और दशहरा के भव्य आयोजन का लुत्फ उठाते हैं। कोटा दशहरा बड़े ही भव्य तरीके से मनाया जाता है। कोटा के ‘दशहरा मैदान’ में रावण, कुंभकर्ण,और मेघनाद के 75 फुट का पुतला लगाया जाता है और राम की वेशभूषा को धारण कर एक व्यक्ति तीर से इन पुतलों पर निशाना लगाता है। पटाखों से भरे ये पुतले काफी देर तक जलते हैं। इसे देखने के लिए यहां लाखों की भीड़ इकट्ठा होती है। हालांकि, इस बार ‘कोरोना महामारी’ के कारण पूरे भारत में दशहरा का त्योहार सीमित तरीके से मनाया जा रहा है। कोटा में भी स्थानीय प्रशासन कोरोना महामारी के दिशा-निर्देशों को ध्यान में रख कर दशहरे का आयोजन करवा रही है। इस बार दशहरा मैदान में रावण, कुंभकर्ण, और मेघनाद का पुतला प्रतीकात्मक ढंग से जलाया जाएगा। इसके साथ ही इस बार दशहरा मैदान में किसी को भी अंदर जाने नहीं दिया जायेगा। मैदान में भीड़ इकट्ठा होने की पूरी मनाही है। पुतला दहन को इस बार वहां के स्थानीय चैनलों पर सीधा प्रसारित करवाया जाएगा।
कोटा दशहरा के उत्सव में दशहरा मेले का आयोजन बहुत लोकप्रिय है। यह मेला 25 दिनों तक चलता है। 25 दिनों तक चलने वाले इस मेले में कई सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जिनमें कवि-सम्मेलन, भजन संध्या, राजस्थानी लोक नृत्य, सिंधी सांस्कृतिक कार्यक्रम, मुशायरा, पंजाबी कार्यक्रम, कव्वाली और भोजपुरी नृत्य जैसे कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इसमें देशभर के नामी-गिरामी कलाकार आते हैं और अपनी कला से दर्शकों का मनोरंजन करते हैं। 25 दिन का यह समय राजस्थान के लिए त्योहारमय होता है। इस मेले में राजस्थान और इसके बाहर से लाखों की संख्या में लोग आते हैं।
25 दिनों तक चलने वाले इस मेले में सांस्कृतिक गतिविधियों के अलावा व्यापार संबंधी गतिविधियां भी होती हैं। लोग दूर-दूर से यहां जरूरत के सामानों की खरीद-बिक्री के लिए आते हैं। दशहरा मेला में करोड़ों का व्यापार होता है। कोटा में दशहरे मेले का यह आयोजन बहुत ऐतिहासिक है। लोगों का मानना है कि 17वीं-18वीं शताब्दी से ही इस मेले का आयोजन होता आ रहा है जो कि अभी तक जारी है। समय के साथ मेले के प्रारूप में कई बदलाव भी आए हैं। कोटा में दशहरा का आयोजन राजपूत राजा ‘दुर्जनशल सिंह’ के समय से ही होता आ रहा है। उस समय दशहरे मेले का आयोजन 3 दिनों तक किया जाता था जो कि अब 25 दिनों तक चलता है। कोटा दशहरा राजस्थान का सांस्कृतिक प्रतीक है। यहां के लोग इस अवसर पर बड़ी ही तन्मयता और श्रद्धा के साथ देवी दुर्गा की पूजा-अर्चना करते हैं और बुराई पर अच्छाई की जीत की भावना को अपने जीवन में उतारने का प्रण लेते हैं।

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