जागो

राघवेन्द्र चतुर्वेदी

विश्व पर्यावरण दिवस  ( जून, २०२१) पर

जाग उठो हे जीव-श्रेष्ठ अब है कैसा इंतज़ार,
हाथ हाथ पर धरे, कर रहे हो क्या विचार?
हिमशिखा पिघल रही, अश्रु नीर बह रहे
कंपकंपा रही धरा के मौन स्वर कह रहे
कालिछिद्र बढ़ रहा, लुट रहा है गगन
प्राणवायु जल रही, उष्ण हो रही पवन
अग्नि उदर में लिए धधक रही है धरा
चित्र ये विचित्र है मित्र शत्रु बन रहा
चित्रकार ने भरे थे रंग फूल फूल में
मिट रहा है फर्क अब बाग़ और बबूल में
हरीतिमा गयी कहाँ, कहाँ सुगंध खो गई
स्वार्थ निमित्त मनुष्य की बुद्धि कुंद हो गई
काल रूप ले चुका है स्वार्थ तमस का प्रसार
दृष्टिगोचर हो रहा प्रकृति पर किया प्रहार I
जाग उठो हे जीवश्रेष्ठ अब है कैसा इंतज़ार,
हाथ हाथ पर धरे कर रहे हो क्या विचार?

जीव-श्रेष्ठ = मनुष्य , कालिछिद्र = ब्लैक होल, प्राणवायु = ऑक्सीजन, उदर = पेट, मित्र = सूर्य, तमस = अंधकार

Raghavendra Chaturvedi

लेखक के बारे में:

उत्तर प्रदेश के एक छोटे से जनपद इटावा के मूल-निवासी राघवेन्द्र चतुर्वेदी का जन्म कानपुर में हुआ था. उन्होंने इटावा और आगरा में शिक्षा ग्रहण की. शिक्षकों के परिवार में जन्मे राघवेन्द्र, मानवीय मूल्यों और धार्मिक संस्कारों के प्रति सुदृढ़ रूप से आस्थावान हैं.

राघवेन्द्र ने समाजशास्त्र और कार्बनिक रसायनशास्त्र में परास्नातक उपाधि प्राप्त की है और रसायनशास्त्र से सम्बंधित विभिन्न क्षेत्रों जैसे कि उत्कृष्ट रसायन (Fine Chemicals), आनुवंशिक रसायन (Genetic Intermediates), सक्रिय औषधीय घटक (Active Pharmaceuticals/Bulk Drugs), बहुलक रसायन परत (Polymer Coatings) और भूषाचार तकनीक (Fashion Technology) में सेवाकार्य किया है.

राघवेन्द्र की व्यावसायिक क्रियात्मक यात्रा अत्यंत गतिशील रही है. उन्होंने एक ओर अत्यंत कठिन और जटिल रासायनिक क्रियाओं का निष्पादन करते हुए संवेदनशील अणुओं जैसे डीएनए, आरएनए तथा प्रोटीन के घटकों और जीवन रक्षक सक्रिय औषधीय पदार्थों जैसे पेनिसिलिन और सिफालोस्पोरिन प्रतिजैविकों पर अनुसन्धान कार्य किया है तो दूसरी ओर अत्यंत क्रियाशील और विस्फोटक प्रकृति के रासायनिक पदार्थों का संश्लेषण भी किया है.

स्वैच्छिक सेवा-निवृत्ति लेने के उपरान्त अब राघवेन्द्र स्वतंत्र रूप से व्यापारिक संस्थानों को तकनीकी परामर्शसेवा देते हैं.

उन से सम्बन्ध स्थापित करने के लिए [email protected] पर लिखें

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