“हमारे उत्तर बिहार में एक त्यौहार है -छठ। काफी हर्षोल्लाष से मनाये जाने वाला यह त्यौहार हर साल दिवाली के कुछ दिनों बाद आता है और पूरे चार दिनों तक चलता है। मतलब अगर तुम्हे कभी श्रद्धा एकता और पवित्रता के सही मायने देखने हो न तो एक बार हमारे यहाँ जरूर आना। यकीन मानो तुम्हे वहां से प्यार हो जाएगा” अनीता ने एक ही सांस में सब कह डाला। और वो जब भी भारत की बातें करती है, उसके चेहरे के रौनक देखते ही बनती है।

अनीता पच्चीस वर्ष की एक कार्यकुशल लड़की है जो काम के सिलसिले में अकसर विदेश में ही रहती है।  कामयाबी के आकाश में उड़ कर भी उसे अपनी मिट्टी ही सर्वप्रिय है।  अनीता की सबसे खास बात यह है की उसे उदास या किसी की शिकायत करते हुए शायद ही किसी ने देखा हो। हमेशा सबको खुशियां और स्नेह ही बांटते रहती है। मल्टी नेशनल कम्पनी में काम करने वाली अनीता साल में एक बार किसी तरह अपनों के पास जरूर लौटती है, वहां जहाँ उसकी आत्मा रहती है। लेकिन इस साल सब कुछ उथल -पुथल हो गया।  कोरोना महामारी ने पुरे विश्व को अपने चपेट में ले लिया था। पहले इस लॉक डाउन के कारन विदेश में ही फंस गयी और अब ये कंपनी वाले अपने घाटे से उभरने के कारन उसे छुट्टी भी नहीं दे रहे थे। अनीता की आत्मा बुरी तरह दुःख रही थी। अब न उसका जी काम ने लग रहा था न ही वह छुट्टी ले पा रही थी। पर किसी तरह उसने अपने आप को काम में उलझाए रखा। पर मन को कहाँ कोई रोक सकता है ! उसका भी मन  बार बार अपने परिवार में जा अटक रहा था।

पर कहते है न हमारे परिवार से दूर भी एक परिवार होता है – हमारे दोस्त। उनसे लाख छुपाओ पर वो तो आपके मन की व्यथा समझ ही लेते है।  अनीता के भी दोस्त उसके इस फीकी मुस्कान से दुखी थे।  उन्होंने तय किया चाहे थोड़ा ही सही लेकिन वो सब अनीता को अपने घर की कमी न महसूस होने देंगे।

देखते ही देखते दिवाली का त्यौहार भी आ गया। “आज तो सब कितने व्यस्त होंगे, माँ कितनी सारी मिठाइयाँ बनती होंगी।  पूरा परिवार सजावट और दिवाली की दौर भाग में होगा। देखो तो मुझे बस एक व्हाट्स एप पे शुभकामनाएं भेज दी। ” सोचकर वह और दुखी हो उठी। इतने में ही रोबर्ट का फ़ोन आया और उसे काम के सिलसिले में एक निश्चित जगह पर मिलने से बुलाया। बेमन से वह नहाने और तैयार होने गयी। खैर ! काम है तो करना ही होगा।

कैब पकड़ कर जब वह निश्चत स्थान पर गयी तो वो देखते ही रह गयी। किसी पार्क को सजाया गया था। एक कोने में एक मंदिर लाया गया और उसमे मूर्ती को विराजित किया गया। सारे लोग भारतीय परिधान में क्या खूब जच रहे थे ! अनीता के आंखों में आँशु आ गया।  वो अपने दोस्तों के पास गयी जहाँ एक कोने में भारतीय भोजन किसी विडिओ से देख बना रहे थे। वो इतनी खुश थी की वो कुछ बोल ही नहीं पा रही थी। अंत में इतना ही बोल पायी की “ मैं समझती थी कि हमारा भारत बस भारत में ही है।  मैं तो भूल ही गयी थी त्यौहार अपनों से है , और अपने वो है जो आपकी खुशियों के लिए कुछ भी कर सकते है।  शुक्रिया और बहुत सारा प्यार !!! ” सभी आँखों में आंशू  थे और सभी की मुस्कान से ये दिवाली और चकमका रही थी।

नोट: यह एक काल्पनिक कृति है। जीवित अथवा मृत किसी भी व्यक्ति से किसी भी प्रकार की समानता पूर्णतः संयोग हो सकता है ।

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