देवी दुर्गा को आराध्य मानकर पूरे भारत के अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग नामों से इसकी पूजा-अर्चना की जाती है। कहीं इसे ‘मैसूर दशहरा’ के नाम से जाना जाता है तो कहीं ‘कोटा दशहरा’ के नाम से। 10 दिनों तक मनाए जाने वाले इस नवरात्रि या दशहरे में देवी दुर्गा की पूजा-अर्चना की जाती है। मैसूर दशहरा कर्नाटक में प्रसिद्ध है। इस बार मैसूर दशहरा का उत्सव 17 अक्टूबर से लेकर 27 अक्टूबर तक मनाया जा रहा है। दशहरा हिंदू धर्म के लोगों के लिए बहुत बड़ा त्योहार माना जाता है। लोग इसे बड़े धूमधाम से मनाते हैं। मैसूर दशहरा अन्य सभी  दशहरा से भिन्न है । यह बिल्कुल ही अलग तरीके से मनाया जाता है। पूरे 10 दिनों तक मनाए जाने वाले मैसूर दशहरा के समय मैसूर के राज दरबार में, जिसे मैसूर पैलेश के नाम से जाना जाता है- वहां बड़ी चहल-पहल होती है। इस पैलेश को आगंतुकों और श्रद्धालुओं के लिए खोल दिया जाता है। इस पर्व का सबसे ख़ास और लोकप्रिय दिन होता है आखिरी दिन यानि विजयादशमी का। इस दिन यानी आखिरी दिन को यहां ‘जम्मू सवारी’ मनोरंजन का केंद्र होती है।
अंतिम दिन यहां जम्मू सवारी निकाली जाती है। लोग इसे दूर-दूर से देखने के लिए आते हैं। यह दृश्य मनोरंजनकारी और मनोरम होता है। इस जम्मू सवारी में कुल 12 हाथियों का एक जुलूस निकाला जाता है, जिसमें एक हाथी के पीठ पर चामुंडेश्वरी देवी की प्रतिमा को बैठाया जाता है और फिर इसके बाद नगर-भ्रमण कराया जाता है। जुलूस में शामिल सभी हाथियों को फूल-मालाओं और आभूषणों से सजाया जाता है। हाथियों के जुलूस के आसपास ख़ास प्रकार के वस्त्रों से सुसज्जित पहरेदारों की एक मंडली इसको चारों ओर से घेरे रहती है और इसके पीछे-पीछे श्रद्धालुओं और दर्शकों की एक लंबी भीड़ साथ-साथ चलती है। इस उत्सव को अम्बराज के नाम से जाना जाता है।
मैसूर दशहरे के समय यह प्रसिद्ध ‘होदा’, जिसमें देवी माँ की प्रतिमा रख कर नगर-भ्रमण कराया जाता है- लोगों के केंद्र में होता है। इस हौदे  को साल भर में एक बार दशहरे के समय माता की सवारी के लिए प्रयोग में लाया जाता है। लोगों को मानना है कि इस हौदे में ही मैसूर के राजा नगर-भ्रमण के लिए निकला करते थे।  यह पूरी तरह से स्वर्ण-जड़ित हौदा है। इस हौदे को देखने पर सभी आश्चर्यचकित होते हैं। यहां के लोगों का मानना है कि मशहूर के कारीगरों ने इस हौदे को सिर्फ हथौड़ी और छैनी से ही बनाया था। इसमें जड़ित सोने और भव्य नक्काशी लोगों को अपनी और आकर्षित करती है। गौरतलब है कि पुराने समय में मैसूर के राजा इस हौदे का प्रयोग अपनी सवारी के लिए क्या करते थे। मैसूर दशहरा से जुड़े और भी कई पहलू हैं जो लोगों को हैरान करते हैं। इस उत्सव के दौरान लाखों की संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक यहां आते हैं। इतिहासकार बतलाते हैं कि मैसूर दशहरा कर्नाटक के सबसे शक्तिशाली राजवंश ‘विजयनगर’ के सबसे महत्वपूर्ण उत्सव के रूप में प्रख्यात था। इस अवसर पर कई भव्य सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते थे, जिसकी परंपरा अभी तक अक्षुण्ण है। दशहरे के अंतिम दिन यहां प्रदर्शनी भी लगाई जाती है।
मैसूर दशहरा कर्नाटक की संस्कृति का महत्वपूर्ण अंग है। बंगाल में जिस प्रकार दुर्गा पूजा बड़ी धूम-धाम से मनाया जाता है उसी प्रकार कर्नाटक में मैसूर दशहरा मनाया जाता है। इस उत्सव के दौरान कर्नाटक के बाहर से भी लोग इसका जश्न मनाने आते हैं और यहां के इस दशहरे के मनोरंजन गतिविधियों में शामिल होते हैं।  यहां कि सरकार भी इस अवसर पर कर्नाटक के लोगों और यहां आने वाले श्रद्धालुओं एवं पर्यटकों के लिए अच्छे इंतेज़ाम करती है।

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