मुंबई!! अनवरत चलनेवाला शहर। मगर २६ जुलाई २००५ को इसकी रफ़्तार रुक गयी थी। अचानक बादल फटने के कारण २४ घंटों के अंदर हुई ९९४ एम् एम् बारिश ने पूरे शहर को डुबो दिया था।

सुबह से ही तेज़ बारिश हो रही थी। मगर मुंबईकरों को बारिश और उससे होने वाली मुसीबतों से जूझने की आदत हो चुकी थी। अतः सब अपने दैनिक कार्यों के निमित्त निकल रहे थे। हमारा घर वाशी में है और दूकान कालबादेवी में। करीब १८-२० की मी दूर। लोकल ट्रेन और टैक्सी से जाना पड़ता था।

मेरे पति प्रशांत ने कहा ” मैं दूकान जा रहा हूँ। यदि कुछ लगेगा तो जल्दी आ जाऊंगा। तुम चिंता मत करो। ”

परन्तु किसी ने न सोचा था के शाम होते होते बारिश विकराल रूप धर लेगी।

मैंने दोपहर ३ बजे फ़ोन किया ” बारिश बहुत ही हो रही कहीं ट्रेन बंद न हो जाए। आप जल्दी आ जाइये। ”

प्रशांत बोले ” ठीक है। थोड़ी देर में निकलता हूँ ”

बस वही उस दिन की हमारी आखरी बात थी। थोड़ी देर में फ़ोन सब बंद पड़ गए। संपर्क का कोई साधन नहीं बचा। रात हो चली थी मगर प्रशांत का कोई पता ना था। मैं बेहद चिंताग्रस्त थी। रात के २ बजे घंटी की आवाज पे दौड़ कर दरवाज़ा खोला तो प्रशांत पूरी तरह से भीगे हुए जमीन पर ही बैठे मिले। खड़े होने की भी शक्ति नहीं बची थी। मैंने सहारा देकर सोफे पर बैठाया और तौलिया लाकर पोंछकर कपडे बदले। चाय, ब्रेड और क्रोसिन की गोली खिलाई। करीब ४ घंटे सोने के बाद जब सामान्य हुए तब पूरी बात बताई।

” ४ बजते बजते दूकान के आस पास पानी भरने लगा। मैं सब बंद कर जल्दी से निकला तो कोई सवारी नहीं मिली। पैदल ही स्टेशन चल पड़ा।  मगर पता चला कि ट्रेन बस टैक्सी सब बंद हो चुकी हैं। मैंने सोचा थोड़ी दूर चलकर शायद कोई सवारी मिल जाएगी। उसी समय समंदर में आये हाई टाइड ने अचानक शहर में तेजी से और पानी भर दिया। घनी आबादी के कारण रोज निकलने वाला टनों कचरा नालियों में फंस कर बाढ़ जैसी स्थिति बना रहा था। आगे बढ़ने पर पानी का बहाव तेज होने लगा था और जहाँ तहाँ लोग खुले मैनहोल में गिर रहे थे। बिल्डिंगों की दो-तीन मंजिलें भी पानी में डूबने लगी थी। सड़क कहीं दिख ही नहीं रही थी, केवल तेज बहता पानी ही था चारों ओर। फिर लोगों ने तरकीब निकली और सब एक दूसरे का हाथ पकड़ कर इंसानी चेन बनाकर चलने लगे जिससे कोई बह ना जाये। कई जगह लोग ऊपर से ही पानी की बोतलें फेंक कर दे रहे थे जिससे हमें प्यास बुझाने में बड़ी सहायता मिली। किसी का घर आ जाता तो वह चला जाता फिर कोई और चेन में जुड़ जाता।इसी तरह चलते चलते मैं घर तक पहुंचा। मगर अब पैर बेजान लग रहे हैं। ”

मैं ईश्वर का धन्यवाद् कर रही थी कि प्रशांत सुरक्षित घर आ गए थे। २ दिन लग गए उन्हें वापस खड़े होने में।

मगर मुंबई १ महीने तक उस बाढ़ का असर झेलती रही। फिर से रफ़्तार पकड़ने में समय लग गया। इस के बाद ही नागरिकों में जागरूकता अभियान चलाये गए। कचरा प्रबंधन से बेहतर विकल्प ढूंढे गए और प्लास्टिक की थैलियों पर प्रतिबन्ध लगाया गया। लोगों को यह समझना ही पड़ेगा कि प्रकृति के साथ खिलवाड़ हमेशा ही महंगा पड़ता है। धरती हमारी है और उसे सहेजने की ज़िम्मेदारी भी हमारी ही है।

नोटयह एक काल्पनिक कृति है। जीवित अथवा मृत किसी भी व्यक्ति से किसी भी प्रकार की समानता पूर्णतः संयोग हो सकता है ।

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